गुरुवार, सितंबर 02, 2010

दोहा -विकास

शोर विकास का हो रहा ढूँडो कहाँ विकास ,
खेत जमीनें छिन रहीं ,मजे ले रहे   खास |

पोखर     नेता  ले   उड़े , टीले       ठेकेदार,
लूटमार के दौर में , हो रहि    मारम्मार |

1 टिप्पणी:

  1. वाह व्‍यंग्‍य गुरू, विकास के नाम पर देश का जो बंटाधार हो रहा है। उसका आपने सही चित्र प्रस्‍तुत किया है। अफसोस इस बात का है कि इतने शोषण और अत्‍याचार व भ्रष्‍टाचार के बावजूद जनता मौन क्‍यों है। हमें लगता नहीं कि कभी यहां क्रांति होगी। लेकिन कवि को अपने दायित्‍व को निभाना नहीं छोडना चाहिए।

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